स्टे ऑर्डर कैसे लिया जाता है ?
जीवन की अधिकतर समस्याएं बिना जानकारी के होती हैं, किसी भी बात की ठीक ठाक जानकारी हमें परेशानी में पड़ने से रोक सकती है... हर बात खुद के अनुभव से सीखी नहीं जाती, कई जानकारियां ऐसी होती हैं, जिनको किसी अन्य के अनुभव से ही सीखा जाना चाहिए... खुद के अनुभव से हम कोई काम निपटा नहीं सकते... व्यक्ति को हमेशा कुछ न कुछ सीखते रहना चाहिए... कई शोध इस बात का दावा करते हैं कि हमेशा कुछ न कुछ नया करते रहने वाला व्यति ज्यादा उम्र पाता है... आज हम स्टे ऑर्डर पर जानकारी देंगे... जो भविष्य में आपके बहुत काम आ सकती है...!
स्टे ऑर्डर होता क्या है...?
जब कोई विरोधी पक्ष का व्यक्ति या पार्टी हमारे हितों के प्रतिकूल कोई कार्य करता है और उसको रोकने के लिए हमें प्रशासन की जरूरत होती है, प्रशासन का उस मामले में हस्तक्षेप सिविल कोर्ट के आदेश से ही संभव है... सिविल कोर्ट से उस कार्य को रूकवाने के लिए हमें कोर्ट के सामने एक एप्लीकेशन प्रस्तुत करनी होती है, जिसमें निवेदन करना होता कि विरोधी पक्ष हमारे हितों के विपरीत कार्य कर रहा है, जिसे रोकने के लिए स्टे ऑर्डर यानी निषेधाज्ञा आदेश दिया जाए... कब कोर्ट द्वारा हमारे पक्ष में आदेश जारी किया जाता है तो उसी आदेश को स्टे ऑर्डर कहा जाता है...!
स्टे ऑर्डर किन किन विषयों में जारी किया जा सकता है...?
- किसी भूखंड पर हो रहे नए निर्माण को रूकवाने के लिए
- जमीन पर कब्जा करने से रोकने के लिए
- किसी निर्माण को तोड़ने से रोकने के लिए
- किसी प्रॉपर्टी में किसी को प्रवेश करने से रोकने के लिए
- किसी विभाग को हमारे खिलाफ कोई कार्यवाही करने से रोकने के लिए
- किसी अवैध विवाह को रोकने के लिए
मिलता कैसे है...?
दो पक्षों में विवाद चल रहा हो और या उस मामले में कोर्ट केस चल रहा हो और को एक पक्ष उस परिस्थिति में कोई ऐसा कार्य कर दे... उसके लिए सिविल कोर्ट में खुद या वकील के द्वारा एक प्रार्थना पत्र प्रस्तुत की जाति है, और उस संपति के जितने कागजात हमारे पास होते हैं, वे सभी कोर्ट के सामने पेश करने होते हैं... कोर्ट उस मामले को स्टडी करके स्टे ऑर्डर जारी करती है...! स्टे ऑर्डर प्रार्थना पत्र के आदेश 39 नियम 1 व 2 के अंतर्गत पेश किया जाता है...! बिना किसी पूर्व वाद के
स्टे ऑर्डर लेने में काफी दिक्कतें आती हैं..!
जब कोई नया दावा स्टे की अर्जी के तहत पेश किया जाता है, अर्जी पेश करने वाले को कोर्ट को ये विश्वास दिलाना चाहिए कि यह दावा अतिआवश्यक प्रकृति का है और प्रार्थी को सुनकर कोई भी आदेश नहीं किया गया तो प्रार्थी के दावा पेश करने का कोई अर्थ ही नहीं रह जाएगा... तथा प्रार्थी के साथ घोर अन्याय होगा... इस तरह से न्यायलय को ये विश्वास हो जाता है तो तुरंत ही आदेश जारी कर दिया जाता है... और एक या दो दिन में ही न्यायालय पत्रावली को सुनवाई के लिए तारीख दे देता है... उस तारीख पर विरोधी पक्ष उपस्थित होकर अपना जवाब दाखिल कर देता है तो कोर्ट इस स्टे की अर्जी को सुनकर अपने विवेक से आदेश जारी कर देता है...!
यदि विरोधी पक्ष उपस्थित तो हो जाता है लेकिन कोई जवाब दाखिल नहीं करता है, लेकिन अपना जवाब दाखिल करने के लिए समय चाहता है तो कोर्ट अंतरिम स्टे जारी करके दोनों पक्षों की सुनवाई करता है और सुनवाई के बाद कोर्ट अपने विवेक से आदेश देता है... इसमें 5 से 7 दिन लग जाते हैं...!
यदि परिस्थिति ऐसी है कि स्टे ऑर्डर जारी करने से पूर्व ही विरोधी पक्ष को रोका जाना आवश्यक है तो कोर्ट विरोधी पक्ष को सुने बिना ही स्टे ऑर्डर जारी कर सकता है...!
यदि विरोधी पक्ष स्टे ऑर्डर की पालना नहीं करता है तो कोर्ट के पास क्या पावर है...?
सिविल प्रोसीजर कोर्ट के आदेश 39 नियम 2A के तहत कोई पक्षकार कोर्ट के स्टे ऑर्डर की अवज्ञा करता है तो इसे कंटेंप्ट ऑफ कोर्ट माना जाता है और अर्जी लगाए जाने पर कोर्ट कोर्ट उस पक्ष की संपत्ति कुर्क करने का आदेश जारी कर सकता है... इसमें 3 महीने के कारावास का भी प्रावधान है...! इसके बावजूद भी विरोधी पक्षकार कोर्ट के स्टे ऑर्डर की अवज्ञा करता है तो कोर्ट उस कुर्क की गई संपत्ति को बेचकर प्रथम पक्षकार को हुए नुकसान की भरपाई कर सकता है..!
ये थी जानकारी स्टे ऑर्डर के विषय में... आपको कैसी लगी...? कमेंट करके जरूर बताएं...!

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